हां।
एक सफर बिना किसी उम्मीद के साथ।
मुश्क़िल है। ..... मगर हां, तय करना ही मेरा काम है , हर मुस्कुराहट में , हर एक पल, नया जीने की पूरी कोशिश ....... बिना मुरझाये हुए।
इस सफ़र में बहुत कहानिया है। हर रोज हर नयी ख़ुशी के साथ।
एक मेरी परछाई भी है। जिसने अभी तक साथ न छोड़ा है। ....... और सायद न ही छोड़ेगी अभी। एक वही है जो मुझे हर रोज़ नयी नयी कहानिया सुना देती है। और हर वक़्त मेरे साथ रहने की ज़िद कर बैठी है...... बेबकूफ है।
समझाया मैंने कई बार पर नहीं मानती है.. हर बात।
मेरे इस सफर में मेरा साथ देने के लिए हर दम मेरी परछाई मेरे साथ है। ये मुझे तो पता है मगर..... परछाई ये सब जानती है ये ..... सच तो मुझे भी नहीं पता मगर हां.. जानती ही होगी।
मैं आपको बता दूँ।

ये जो परछाई है न , ये हजार " ख्वाइशों" जो बेवक़्त की गई, उनसे कई गुना कारगर साथी है। साथ रहकर ख्वाइशें साथ छोड़ जातीं हैं मगर परछाई हमेशा साथ रही। बिना कुछ मांगे बिना कुछ बोले हमेशा, यहाँ तक की हम लोग सोचते है की परछाई सिर्फ उजाले की साथ होती है, और अंधेरा होते ही साथ छोड़ जाती है।
मगर मैं आपको बता दूँ। मेरी परछाई थोड़ी सी अलग है। थोड़ी सी मासूम और बहुत ज्यादा ज़िद्दी है सच कहूँ तो पूरी हरी भरी लाल मिर्च या मिर्ची की शहज़ादी। .......
हां ! बिलकुल !
कहा था न , ये मेरी परछाई है। थोड़ी सी अलग जो वक़्त के, किसी भी पहर .... मेरे हर सुख दुःख में मेरे साथ रही मगर मज़ाल है, की उसने कभी जताया भी हो।
ये, सुबह की पहली किरण के साथ ही उजाले से उभरती हुई मन को सुखुन देते हुए आती है और ढलते सूरज के साथ जब उसका दिखना बंद जो जाता है, तो लोग यही राय बना लेते की परछाई अंधेरों में साथ छोड़ जाती है। मगर ये कुछ भी कहें।

मेरी परछाई।
ढलते हुये सूरज के साथ ही, जब अंधेरा होने लगता है। तो वो मेरे जिस्म में समां जाती है। ..... कियोकि मेरे जिस्म में कभी अंधेरा था ही नहीं ......वो जिसे हम अंधेरा ( अकेला) समझते असल में वो मेरी परछाई ही थी.......
कियोकि " एक मेरी परछाई " ही है, जिसने.... घने अंधकार में भी मेरा साथ नहीं छोड़ा और मेरे जिस्म के अंदर रहकर उसने मेरा होंशला और हिम्मत दोनों को इकट्ठा कर मुझे उस अंधकार से लड़ने के लिए तैयार कर दिया।
सच ...
कहा था न, बहुत ज़िद्दी है, मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती है।
ये मेरा वो हिस्सा है, जिससे में कभी दूर न रह सकता हूँ, और न ही कभी रहना चाहता हूँ।
मेरी परछाई को,
मैं हर रोज नया नाम देता हूँ।
उसकी तमाम नराजगियो के बाद भी,
मुझे नाम देने से न रोक पाती है। उसके कई नामों में से जो मेरे दिल के पास है वो है
"रज़िया सुलतान" पता नहीं ...... पर हां, यही नाम मुझे उसका बहुत अच्छा बहुत अच्छा लगता है।
उसका पहली दफा
बहुत देर बाद जब
अगले ही पल जब
जाने ही लगे थे ,की
बहार दरवाजे की ओर चल
एक सफर बिना किसी उम्मीद के साथ।
मुश्क़िल है। ..... मगर हां, तय करना ही मेरा काम है , हर मुस्कुराहट में , हर एक पल, नया जीने की पूरी कोशिश ....... बिना मुरझाये हुए।
इस सफ़र में बहुत कहानिया है। हर रोज हर नयी ख़ुशी के साथ।
एक मेरी परछाई भी है। जिसने अभी तक साथ न छोड़ा है। ....... और सायद न ही छोड़ेगी अभी। एक वही है जो मुझे हर रोज़ नयी नयी कहानिया सुना देती है। और हर वक़्त मेरे साथ रहने की ज़िद कर बैठी है...... बेबकूफ है।
समझाया मैंने कई बार पर नहीं मानती है.. हर बात।
मेरे इस सफर में मेरा साथ देने के लिए हर दम मेरी परछाई मेरे साथ है। ये मुझे तो पता है मगर..... परछाई ये सब जानती है ये ..... सच तो मुझे भी नहीं पता मगर हां.. जानती ही होगी।
मैं आपको बता दूँ।

ये जो परछाई है न , ये हजार " ख्वाइशों" जो बेवक़्त की गई, उनसे कई गुना कारगर साथी है। साथ रहकर ख्वाइशें साथ छोड़ जातीं हैं मगर परछाई हमेशा साथ रही। बिना कुछ मांगे बिना कुछ बोले हमेशा, यहाँ तक की हम लोग सोचते है की परछाई सिर्फ उजाले की साथ होती है, और अंधेरा होते ही साथ छोड़ जाती है।
मगर मैं आपको बता दूँ। मेरी परछाई थोड़ी सी अलग है। थोड़ी सी मासूम और बहुत ज्यादा ज़िद्दी है सच कहूँ तो पूरी हरी भरी लाल मिर्च या मिर्ची की शहज़ादी। .......
हां ! बिलकुल !
कहा था न , ये मेरी परछाई है। थोड़ी सी अलग जो वक़्त के, किसी भी पहर .... मेरे हर सुख दुःख में मेरे साथ रही मगर मज़ाल है, की उसने कभी जताया भी हो।
ये, सुबह की पहली किरण के साथ ही उजाले से उभरती हुई मन को सुखुन देते हुए आती है और ढलते सूरज के साथ जब उसका दिखना बंद जो जाता है, तो लोग यही राय बना लेते की परछाई अंधेरों में साथ छोड़ जाती है। मगर ये कुछ भी कहें।

मेरी परछाई।
ढलते हुये सूरज के साथ ही, जब अंधेरा होने लगता है। तो वो मेरे जिस्म में समां जाती है। ..... कियोकि मेरे जिस्म में कभी अंधेरा था ही नहीं ......वो जिसे हम अंधेरा ( अकेला) समझते असल में वो मेरी परछाई ही थी.......
कियोकि " एक मेरी परछाई " ही है, जिसने.... घने अंधकार में भी मेरा साथ नहीं छोड़ा और मेरे जिस्म के अंदर रहकर उसने मेरा होंशला और हिम्मत दोनों को इकट्ठा कर मुझे उस अंधकार से लड़ने के लिए तैयार कर दिया।
सच ...
कहा था न, बहुत ज़िद्दी है, मुझे कभी अकेला नहीं छोड़ती है।
ये मेरा वो हिस्सा है, जिससे में कभी दूर न रह सकता हूँ, और न ही कभी रहना चाहता हूँ।
मेरी परछाई को,
मैं हर रोज नया नाम देता हूँ।
उसकी तमाम नराजगियो के बाद भी,
मुझे नाम देने से न रोक पाती है। उसके कई नामों में से जो मेरे दिल के पास है वो है
"रज़िया सुलतान" पता नहीं ...... पर हां, यही नाम मुझे उसका बहुत अच्छा बहुत अच्छा लगता है।
एक अटपटी सी बात में … लिपटी एक याद पुरानी।
Er. Mandev Jangid | Poetry
| 15/10/2018
एक अटपटी सी बात में
लिपटी एक याद पुरानी।
उसका पहली दफा
मेरे पास आना
कुछ डर साथ
कुछ झिझक में
मेरे पास बैठना
फिर कुछ देर बाद......
मुझे उन बड़ी बड़ी आँखों से देखना
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
बहुत देर बाद जब
मेरा उसके करीब आना
असहज़ सा था।
कहा नहीं उसने, मगर हां
एक पल के लिए ही सही
उसके कंधे को
मेरे कंधे ने छुआ
पहली दफ़ा
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
अगले ही पल जब
कह दिया उसने की
अब जाना है मुझे
बहुत देर हो गयी है
पलट कर मैंने भी कहा
कुछ देर और
अभी अभी तो तुम आये हो
मगर .... माना नहीं सका
और उसके चेहरे को देखता रहा
जब तक की उसकी आँखों ने
मेरी आँखों से इजाज़त न ले ली
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
जाने ही लगे थे ,की
मैंने कहा
क्या मैं कुछ कह सकता हूँ ??
उसने बड़े प्यार कहा " क्यों नहीं "
और मैंने दिल की तमाम हशरतों में से
एक हशरत मांग बैठा
और कहा
क्या मैं तुम्हे गले मिल सकता हूँ??
उसने चौंकते हुए कहा
नहीं।
बिलकुल नहीं।
गुस्से में
वो उसकी बड़ी बड़ी आँखे
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
बहार दरवाजे की ओर चल
पड़े , हम दोनों
वो कुछ कदम आगे
मैं कुछ कदम पीछे
तमाम सवालों मैं घिरा दिमाक
और दिल
सिर्फ उसके लिए न जाने किस दौड़
का हिस्सा बन गया
जिसकी गति का नियंत्रण
सायद कुछ पल पहले खो चूका था
उसका दिल भी दुखाया था न।
अभी अभी। ...... पर
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
चार कदम आगे
चले जाने पर अचानक
पीछे मुड़कर देखना
उसका
सच दिल की धड़कनों का
एक बार फिर से बढ़ जाना
फिर अचानक
चार कदम पीछे आना
ठीक मेरे सामने
सच। .... अब डर था
उसकी बड़ी बड़ी आँखें
मुझे ही घूर रही थी
हां ..... हां मुझे ही
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
फिर देखा की
थोड़ी थोड़ी
वो ही कपकपा रही है
मैंने कांपती सी आवाज़ में
कहा। ..... क्या हुआ ??
उसने कुछ नहीं कहा
मेरा डर और बढ़ गया
एक फिर
कहा। ..... क्या हुआ ??
उसने मुझे अपनी बाँहों में
कस कर जकड़ लिया
सायद पहली दफा ...
मगर चाहत बेपनाह ....
सच बेपनाह "इश्क़" ....
बिना किसी अल्फ़ाज़ के....
"मानदेव जांगिड़ "







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